Tuesday, October 20, 2015

GauMata

॥ देसी भारतीय गौ, राष्ट्र के लिये वरदान है ।।   


सिर्फ भारत में पाये जाने वाली देसी गाय इतनी गुणकारी है, कि अकेले दम पर पूरे राष्ट्र का  कृषि विकास, स्वास्थ्य विकास, ईंधन आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण कर सकती है, हजारो करोड़ राष्ट्रिय मुद्रा बचा सकती है, समाज में अपराध कम कर सात्विकता ला सकती है।  यह कोई धार्मिक नहीं अपितु वैज्ञानिक परीक्षणों पर परखी गयी बात है।

  • गौदुग्ध को आहार शास्त्रियों ने सम्पूर्ण आहार माना है और पाया है।गाय के एक पौण्ड दूध से इतनी शक्ति मिलती है, जितनी की 4 अण्डों और 250 ग्राम मांस से भी प्राप्त नहीं होती। धरती पर केवल गौदुग्ध ही हैं जो परम सात्विक, ऊर्जावान, बुद्धिवर्धक और स्वास्थवर्धक है, उसके जैसा कोई नहीं।
  • गाय की रीढ़ में सूर्यकेतु नाड़ी होती है, जो सूर्य के संपर्क में आ कर गौदुग्ध में स्वर्ण मिला देती है। यह स्वर्ण मिला गौदुग्ध इसलिए हल्का पीला होता है।
  • गौमूत्र से लगभग 108 रोग ठीक होते हैं जैसे :  मोटापा, कैंसर, डायबिटीज, कब्ज, गैस, भूख की कमी, वातरोग, कफ, दमा, नेत्ररोग, धातुक्षीणता, स्त्रीरोग, बालरोग आदि।
  • गंदगी व महामारी फैलने पर गोबर गौमूत्र का छिडक़ाव करने से लाभ होता है।
  • देसी गाय ही ऐसा जीव है जो स्वास में ऑक्सीजन लेती  है और ऑक्सीजन ही छोड़ती   है।
  • गाय के रम्भाने से वातावरण के कीटाणु नष्ट होते हैं। सात्विक तरंगों का संचार होता है।
  • एक टोला गौघृत का हवन करने से 1 टन आक्सीजन पैदा होता है।  – वैज्ञानिक शिरोविचा, रूस
  • गाय के प्रश्वांस, गोबर गौमूत्र के गंध से वातावरण शुद्ध पवित्र होता है।
  • गाय के पास खड़े हो हाथ फेरने से कई गंभीर मनोरोग ठीक होते  हैं।
  • केवल देसी गाय के गोबर में ही  रॅडीओएक्टिव तरंगों को सोखने की शक्ति होती है। परमाणु संयंत्रों में इसका विशेष प्रयोग होता है।
  • गाय के गोबर से प्रतिवर्ष 4500 लीटर बायोगैस मिल सकता है। अगर देश के समस्त गौवंश के गोबर का बायोगैस संयंत्र में उपयोग किया जाय तो वर्तमान में ईंधन के रूप में जलाई जा रही 6 करोड़ 80 लाख टन लकउ़ी की बचत की जा सकती है। इससे लगभग 14 करोड़ वृक्ष कटने से बच सकते हैं।
  • गाय के गोबर से एक गैस निकलती है जिसे मैथेन कहते हैं और मैथेन वही गैस है जिससे आप अपने रसोई घर का सिलंडर चला सकते हैं और जरूरत पड़ने पर गाड़ी भी चला सकते हैं 4 पहियो वाली गाड़ी भी !!
  • एक स्वस्थ  गाय एक दिन मे 10 किलो गोबर देती है और ढाई से 3 लीटर मूत्र देती है ! गाय के एक किलो गोबर से 33 किलो fertilizer organic  (खाद ) बनती है जो राष्ट्र के कृषि विकास के लियें अत्यधिक लाभकारी है।
  • एक देसी को काटने से उसके मॉस, खून, खाल, हड्डी से लगभग 10000 रुपय का फायदा होता है, परन्तु यदि वही गाय जीवित रहे तो जीवन भर अपने दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर, स्वास, से लाखो रूपये का लाभ राष्ट्र को करती रहती है। यदि दूध न भी दे तो भी गौमूत्र,गौगोबर राष्ट्र के कृषि विकास और पर्यावरण विकास के लिए परम उपयोगी है।  

यह सब लाभ होते है केवल और केवल भारत में पाये जाने वाली देसी गाय  में ना कि विदेशो वाली जर्सी-हॉलीस्टर गायों में। भारतीय देसी गाय जैसा उपयोगी जीव पूरी धरती पर दूसरा नहीं, इसलियें supreme court ने 26 अक्तूबर 2005 में यह निर्णय सुनाया कि "गाय को काटना सांविधानिक पाप है धार्मिक पाप है ! और सुप्रीम कोर्ट ने कहा गौ रक्षा करना,सर्वंधन करना देश के प्रत्येक नागरिक का सांविधानिक कर्त्तव्य है ! सरकार का तो है ही नागरिकों का भी सांविधानिक कर्तव्य है "

अब आप ही बताइएं इतने उपयोगी जीव को मात्र मॉस के लियें मारना स्वयं राष्ट्र के विकास को मारने के सामान है।

गौ संवर्धन राष्ट्रिय कर्तव्य है

कृपया जानकारी को शेयर करें, राष्ट्र के विकास में सामाजिक जागरूकता में सहयोग करें ।

Tuesday, October 13, 2015

selfconfidence

नवरात्रों में करें आत्मविश्वास की साधना

जिसमे आत्मविश्वास है , यह दुनिया उसकी है। चाहे बड़ी से बड़ी चुनौती हो, आत्मविश्वास की शक्ति के आगे हर कोई नहीं ठहर पाता। आत्मविश्वास व्यक्ति जो काम हाथ में लेता है, उसे पूरा करके ही दम लेता है। यह आत्मविश्वास की ही शक्ति है जो व्यक्ति को गुणवान, पराक्रमी, बहादुर, प्रतिभाशाली, सफल व्यक्ति बनती है। पर हम कैसे बने आत्मविश्वासी ? कैसे बढ़ाएं अपने अंदर आत्मविश्वास?
आत्म-विश्वास वस्तुतः आत्मा से प्रकट हुई शक्ति है, जो हमारी आत्मा से निकलती है और हमारे समूचे व्यक्तित्व में घुल कर उसे महान बनती है। भारत के महान आध्यात्मिक धरोहर में कुछ ऐसे उपाय है, जिन्हें अपनाकर हम आत्मविश्वास बढ़ा सकते हैं, अपने व्यक्तित्व को उच्चतम शिखर पर ले जा सकते है।

गायत्री महामंत्र की भाव भरी उपासना (जप) द्वारा हमारी आत्मा एवं मन पर चढ़ी हुई मैल साफ़ होती है, जिससे आत्म-शक्ति पूर्ण रूप से आनी शुरू हो जाती है, और यह आत्म-विश्वास के रूप में हमारे समूचे व्यक्तित्व में घुलने लगती है। मात्र इस छोटे से उपाय द्वारा कोई भी व्यक्ति आत्मविश्वासी बन सकता है, प्रतिभाशाली बन सकता है।
नवरात्री का विशेष समय में ब्रह्माण्ड की प्रचंड शक्ति की वर्षा पृथ्वी पर होती है, अतः इस समय में की गई गायत्री उपसना कई गुना ज्यादा फल देती है।
सुबह में सवच्छ कपडे पहन किसी साफ़ स्थान में कोई दरी/चादर बिछा कर पूर्व दिशा की ओर मुँह कर बैठ जाएँ। सामने किसी किसी स्टूल/टेबल पर एक दीपक एवं जल का लोटा भर के रख ले। मन ही मन सूर्य देव को प्रणाम करें। गहरी श्वास लेते हुए पूर्ण एकाग्रता से गायत्री मन्त्र का भावभरा जप करे। गिनती के लियें माला या घडी का उपयोग कर सकते है। जितना करेंगे उतना अच्छा। अंत में प्रणाम कर के उठ जाएं और जल सूर्य देव को चढ़ा दे। मात्र इतने से उपाय द्वारा आप अपने जीवन में अद्भुत परिवर्तन ला सकते हैं ।

Friday, August 14, 2015

indipendence 2015

एक और लड़ाई पूर्ण स्वतंत्रा के लियें 

बहुत कम होते हैं ऐसे लोग, जिनमे देश के लियें कुछ करगुजरने का ज़ज्बा होता है। भारत के 69 स्वतंत्रा दिवस पर ऐसे सभी योद्धाओं को सलाम, जिन्होंने देशहित में कुर्बानियाँ दी और हमें आज़ाद कराया। अब समय है स्वतंत्रा की दूसरी लड़ाई का, जिसमे भारत को विकृत मानसिकता से स्वतंत्र कराना है। गरीबी, बेरोजगारी, अपराध, अनीति, शोषण से मुक्त कराना है। हमारे वीर शहीदों को पुनः जन्म लेना होगा, अधूरी पड़ी इस लड़ाई को पूरा करना होगा। उस गर्म खून को फिर से बहना होगा, आजके युवाओं का मार्गदर्शन करना होगा।

              वर्ना Open Mentality, Secularism, Professionalism के इस दौर में हम आधुनिक तो हो जायेंगे पर अपनी भारतीयता को भुला कर किसी और संस्कृति-विचारधारा के हो जायेंगे। और ऐसा होना राष्ट्र के लियें घातक है, क्योकि हर राष्ट्र की अपनी संस्कृति-विरासत होती है जो उसका जीवन होती है। यह संस्कृति ही समाज का निर्माण करती हैं; नयी पीढ़ी का निर्माण करती है।

         अगर संस्कृति मर गयी, तो भारत में भी बच्चे अपने तलाकशुदा माँ-बाप के प्यार को तरसेंगे, बुजुर्गों को घर में बोझ समझ उन्हें बहार फ़ेंक दिया जायेगा, पति-पत्नी जीवनभर का सुन्दर वैवाहिक जीवन ना जीपाएंगे। जीवन को मुक्ति का मार्ग न समझ सिर्फ भोग का मार्ग समझा जायेगा, नारी को BOLD, Modern करने के नाम पर उसका दैहिक शोषण किया जायेगा । अवयस्क बच्चियां माँ बनेंगी और उनका role model कोई अमीर फिल्म स्टार होगी, जिनका जीवन चमक-दमक से भरा पर खोखला होता है। ग्रामीण अंचलों में प्रेम-अपनत्व नहीं शोषण और दिखावे का चलन बढ़ेगा और खेती की जगह जमीन बेच अमीर होने का रास्ता हर कोई अपनाएगा ।
 नैतिकता-प्रेम-सम्मान-अपनापन सब पुरानी बातें हो जाएँगी और मतलव से भरे रिश्तो का ही बोलबाला होगा।

           सिर्फ देशभक्त ही इन बातों की परवाह करते हैं, और बहादुरी से इनका सामना कर इन्हें परास्त करते है। पहले भी हमने किया था आजभी हमीं को करना है। सच्चे भारतीय होने का गौरवशाली जीवन जीना है। इस बार लड़ाई अपने आप से है, अपने आस-पास से है । मोर्चा संभाल समाज में कूद पड़ना हैं, किसी न किसी तरीके से समाज को सही दिशा में लाना है । सत्प्रव्र्ति संवर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन करना है । सिर्फ सेवा ही नहीं, संघर्ष भी करना है। और वो सबकुछ करना है जिससे हमारे राष्ट्र का मान बढे। आइयें अपना सामान्य जीवन जीते हुए एक असामान्य काम को अंजाम देते हैं, भारत का पुनर्निर्माण करते हैं ।

Thursday, July 30, 2015

guru poornima

शिक्षक, आचार्य, गुरु, सदगुरु और गुरुपूर्णिमा 

शिक्षक यानि जो किसी विषय पर शिक्षा दे।
आचार्य जो अपने श्रेष्ठ आचरण से शिक्षा दे ।
पहले हमारे आचार्य ही शिक्षक होते थे, अब शिक्षा व्यवसायिक है ।
    
       गुरु जो आपको शिक्षित करने की पूरी जिम्मेदारी ले । चाहे प्यार या दंड से, आपका परिष्कार करते हुए आपको अपनी विद्या में निपुण कर दे। विषय जैसे जीवन विद्या, कला, व्याकरण, युद्ध कौशल इत्यादि ।
सदगुरु जो जन्म-जन्मांतर तक आपका मार्गदर्शन करते हैं, आपको जीवन विद्या सिखाते हैं, और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करा देते हैं ।

       भारत के विश्वगुरु होने का कारण थे यहाँ के विश्वस्तरीय गुरु-आचार्य, जो न केवल अपनी विद्या में सिद्ध थे, अपितु अपने श्रेष्ठ आचरण से शिक्षा देते हुए शिष्य के दोषो को दूर कर उसे मेधावी-प्रतिभावान बना देते थे ।

गुरुपूर्णिमा वह पावन दिन था जिस दिन भारत को सम्पूर्ण विश्व ने अपना गुरु स्वीकार कर लिया था । 

      आज यदि फिर से भारत को अपनी खोयी हुई गरिमा वापस पानी है, तो उसके लियें वही मार्ग स्वीकार करना होगा । भारतीयों को गुरु-आचार्य का व्यक्तित्व एवं चरित्र धारण करना होगा । और जब ऐसे होगा तब पुनः सम्पूर्ण विश्व में गुरुपूर्णिमा मनाई जाएगी और विश्व का गुरु भारत होगा ।

      परन्तु आज गुरु-आचार्य बनाना तो छोड़ो, कोई शिष्य तक नहीं है। शिष्य बनाना जो स्वीकार करता है वह अपने जीवन की बागडोर अपने गुरु के हाथ में सौंप देता है । फिर गुरु की शिक्षा (philosophy) अनुसार अपना जीवन श्रेष्ठता से जीता है । 
      
      कैसे जीना है, कैसे निर्णय लेना है, किस से प्यार करना है, किस से शादी करनी है, कौन दोस्त है कौन दुश्मन, जीवन की कठिनाइयों से कैसे पार पाना है; यह केवल गुरु ही हमें सही तरीके से समझा सकते हैं । और आज जब हमारा कोई गुरु है नहीं, तो हमें यह सब बताएगा कौन, फिर आपाधापी से जीते हुए हम सदा रोते-बिलखते-परेशान रहते हैं ।

      मित्रों जीवन किसी न किसी को अपना गुरु अवश्य बनाइये । यदि आपको अपने आसपास कोई योग्य ज्ञानवान ईमानदार व्यक्ति नहीं मिलता है तो श्रेष्ठ पुस्तकों जैसे गीता, बाइबल, कुरान, गुरुग्रंथसाहिब किसी भी श्रेष्ठ पुस्तक को अपना गुरु मान ले और उसके शिष्य बन जाएँ। नियमित रूप से उन पुस्तकों को पढ़ें और जीवन के प्रश्नों का समाधान उनमें ढूंढें। निश्चित रूप से आपको अपना मार्गदर्शन अवश्य मिलेगा और आपके जीवन में भी गुरु-शिष्य परंपरा का श्रीगणेश हो जायेगा। युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने लोगो को प्रकाश देती 3200 पुस्तकों का सृजन किया जो सभी मनुष्यों को गुरुतर मार्गदर्शन प्रदान करती है । www.awgp.org


Friday, July 17, 2015

bhatki hui pratibha

क्या आप शिक्षित, नौकरीपेशा/व्यापारी है?
क्या आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है?
क्या आप घर-गृहस्थी संभाल रहीं कुशल गृहणी हैं?
क्या आप अपने जीवन में केवल आजीविका अर्जन, घर-गृहस्थी, मौज-मस्ती तक ही सिमित हैं?
सावधान !! कहीं आप भटकी हुई प्रतिभा तो नहीं।
 

पैसा कमाना, परिवार बनाना उसका पालन-पोषण करना,  मौज मस्ती से जीना यह जीवन के आवश्यक अंग हैं । बिना पैसे के आज के समय में अच्छा जीवन अत्यंत कठिन है। मनोरंजन भी हमारे लिए आवश्यक है।

परन्तु देखा जाए तो एक पशु भी यह करता है :: वह अपना भोजन ढूंढता है, प्रजनन करता है , अपने तरीके से मस्ती करता है। तो क्या पशु और मनुष्य में मात्र यही फर्क है कि मनुष्य कपडे पहनते हैं और सभ्य कहलाते हैं।
 सदा पैसा कमाने की धुन में रहना या हमेशा मनोरंजन के सपने देखना एक आध्यात्मिक बीमारी है, जो आज हर व्यक्ति को जकड़े हुई है।

मनुष्य होने का अर्थ है मनुष्यता । मनुष्यता जिसमें हम स्वयं को समाज का एक अंग मानते हुए अपने समय-पैसे-मेहनत का एक भाग समाज के विकास में नियोजित करें । बिना मनुष्यता का धर्म निभाए कोई भी सुखी संतुष्ट नहीं रह सकता भले ही उसके पास पैसे-सम्पन्नता-सुविधा का भण्डार हो, मन में आनंद आत्मा में शांति परलोक में सद्गति कभी प्राप्त नहीं हो सकती ।

अतः जीवन में मनुष्यता को स्थान दें । समाज का बड़ा वर्ग बहुत ही पीड़ा से भरी जिंदगी जी रहा है, उसे सहारा दें। प्रकृति रो रही हैं, वृक्षारोपण करें । समाज में नैतिकता, सदाचार समाप्त हो रहता है। स्वयं नैतिक जीवन जियें औरों को नैतिक शिक्षा दें। हम सब में इतनी क्षमता है यदि हम अपनी मनुष्यता को पेहचानलें तो समाज के विकास के लिए सरकार पर निर्भरता ही समाप्त हो सकती है। औरों को ना देखते अपने जीवन से शुरुआत करें।

अपने मित्र,परिवार, पड़ोस के साथ समाज विकास का मनुष्यता भरा जीवन स्वीकार करें ।  जिसमें विकास हो मनोरंजन हो सेवा हो ।




Monday, July 6, 2015

Prayavaran Based Development

विकास का  प्रमुख आधार : पर्यावरण

शहरीकरण के इस दौर में वर्तमान सरकार विकास-विकास की बात कर रही है, smart cities बनाने  की बात कर  रही है, शहरों को और बढ़ाने की बात कर रही है, सडकों के निर्माण कर दूरदराज के क्षेत्रो को जोड़ने की बात कर रही है । विकास की आवश्यकता हम सबको है लेकिन यह जान लेना भी परम आवश्यक है कि विकास मतलब क्या ? क्या कंक्रीट की बिल्डिंग खड़े कर देना विकास है? क्या खेती की जमीनी लेकर उनपर मकान बना देना विकास है? क्या हरे-भरे पेड़ काट कर सड़क निर्माण करना विकास है?
जीवन को सुविधाजनक, सुरक्षित, शिक्षित, आनन्दायक बनाने के लियें हम जीवन भर मेहनत करते है।  अच्छा बड़ा मकान, अच्छी नौकरी/व्यापार,  अच्छी गाडी,  मनोरंजन के लियें सुविधाएँ, अच्छी शिक्षा,  सुरक्षा-चिकित्सा की सुविधाएँ यह सब हम पाना चाहते है, निश्चित रूप से सरकार भी अपनी योजनाओं द्वारा हमें यही देना चाहती है ।
  लेकिन विकास के इस दिव्यस्वप्न में हम यह क्यों भूल जाते हैं  एक मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है  सांस लेने के लियें साफ़ हवा, छायादार वृक्ष,  खाने के लियें स्वस्थ अनाज, पीने के लियें साफ़ पानी ।  बिना साफ़ हवा, पानी, अनाज के हम ऊपर दी गयी किसी भी विकास योजना के बारे में सोच भी नहीं सकते ।   और दुःख इसी बात का है कि हम अपनी विकास की तमाम योजनाओं में  पर्यावरण, साफ़ स्वस्थ हवा, पानी, अनाज  के लियें कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे ।  हम पश्चिमी देशों के पीछे विकास की दौड़ में अदूरदर्शी हो  दौड़ रहे हैं,  बिना यह सोचे कि हमारे देश की मनःस्थिति परिस्थिति अन्य देशों से भिन्न है ।
    गाँवों से  बने इस देश की मूल भूत ईकाई, गाँव हैं । जहाँ खेती होती हैं, जहाँ से अनाज मिलता है, जहाँ देश का सर्वाधिक प्रतिशत वन्य जीवन/पर्यावरण आता है । पिछले कई दशकों की गड्बडों से गावों में खेती में भारी कमी आई है, किसान आज भी अशिक्षित एवं असहाय है। हर वर्ष मानसून की प्रताड़ना और सरकार की उपेक्षा से  आहत किसान आत्महत्या करता है । जब हम शहर में एयरकंडीशन में बैठ कर पिज्जा खा रहे होते हैं तब हमारे लियें अनाज पैदा कर रहा किसान, मानसून की प्रताड़ना और सरकार की उपेक्षा से दुखी अपने परिवार को सुखद भविष्य की झूठी सांत्वना दे रहा होता है ।  खेती की  दुर्दशा के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में किसान खेती छोड शहर का रुख करते हैं जिससे अपने परिवार का पेट तो भर सकें ।  इस कारण शहरों में जनसँख्या अत्यधिक रूप से बढ़ती जा रही है ,  जिससे महंगाई, प्रदूषण, अपराध सब तेजी  से बढ़ रहा है ।
   सड़क,  मकान,  फैक्ट्री इत्यादि बनाने के लिए तेजी से खेती की उपजाऊ जमीन ले कर , हरे भरे पेड़ काट कर हम विकास कररहे है। किसान को खेती से हटा कर उसे शहर आकर कीड़े-मकौड़े का जीवन जीने के लियें मजबूर कर रहे हैं।  गावं खत्म हो रहे हैं और शहर मोटे होते जा रहे हैं । और इस विकास में हम आधुनिक भारत की कल्पना कररहेँ है । कृपया आप ही बताएं ये  कल्पना सुखद होगी या भयावह ?
       इस आधुनिक भारत में हमारे पास सुन्दर मकान तो  होगा लेकिन पीने का पानी समाप्त हो गया होगा ।  हम शिक्षित तो होंगें लेकिन खाने के लियें समुचित पोषक तत्वों से युक्त अनाज ही नहीं होगा ।  हमारे पास पैसे तो होंगे लेकिन लेने के लियें साफ़ हवा नहीं होगी ।  और यह कोई ज्यादा दूर की बात नहीं दिल्ली, बंगलोरे जैसे शहर इस रस्ते पर चल पड़े हैं ।
    हमें चाहियें ऐसी योजना जिसमें भारत के गावँ उजड़े नहीं सुधरें।  कृषि का क्षेत्र  विज्ञानं की मदद से बेहतर बने । किसान आत्महत्या ना करें और ना ही खेती छोड़े, अपितु खेती से ही अपने परिवार का सुखद भविष्य बनाये ।  निम्न वर्ग को शिक्षित कर उन्हें जनसँख्या बढ़ाने की जगह जीवन को बेहतर बनाने का मार्ग दिखाएँ ।  सड़क बनाने हेतु पेड़ काटने की जगह उन्हें विस्थापित किया जाये और जितने पेड़  काटने हो उससे अधिक पेड़ पहले लगाये जाएँ ।  
  हमें आधुनिक भारत की कल्पना में पर्यावरण को प्रथम स्थान पर रखना ही होगा, क्योकि बिना इस आधार के बाकी सभी विकास बेमाने हैं । यह तथ्य हमारे निजी जीवन में भी लागू होता है। अपने जीवन में विकास की योजनाओं में भी हमें पर्यावरण को प्रथम स्थान देना होगा । अपने घर में खुले मैदान में वृक्ष लगाएं, स्वास्थ्य संवर्धन हेतु साफ़ हवा, मिटटी में योग प्राणायाम करें, अपने तन-मन को स्वस्थ विकसित  करें।  जब पेड़ अपनी छाया, फल, हवा हमें सरकार के द्वारा नहीं अपितु सीधे देते हैं तो फिर हम वृक्ष लगाने के लियें  सरकार का मुँह क्यों देखें ।   ज्यादा ना सही लेकिन अपने घर में पड़ोस में पर्यावरण को  बचाने एवं बढ़ाने के लियें ठोस कदम तो हम  उठा ही सकते हैं । यही आज के विषम समय  की मांग भी है ।








Monday, June 15, 2015

yog_benefits

योग, a holistic way to get maximum of Human Potential

स्वास्थ्य, सफलता, समृद्धि, सुख, आनंद, शांति, प्रेम, सम्मान, यही चाहत होती है हम सबकी और यह पाना हर मनुष्य का अधिकार भी है। पर ऐसा होता नहीं । आधुनिक युग की इस भागदौड़ में हम अकसर पिछड़ जाते हैं । Carrier, Health, Relationship, Happiness सब एक साथ नहीं कमा पाते। तो क्या ऐसा होना असंभव है या सम्भव। प्राचीन आध्यात्म विज्ञानं ने हमें "योग" के रूप में वह सशक्त जीवनशैली दी है जिससे यह होना संभव है।
     शरीर, मन, बुद्धि, प्रतिभा, पराक्रम, व्यवहार, गुण, चरित्र  के रूप में हमारे पास वह ईश्वर प्रदत शक्तियां हैं जिससे हम अपने जीवन में चहुँओर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु विकारों के कारण हम अपनी इन शक्तियों का पूर्ण उपयोग (Maximum Utilization) नहीं कर पाते। कभी हमारा मन भागता रहता हैं, कभी व्यवहार ख़राब होता है, कभी शरीर स्वस्थ्य नहीं रहता तो कभी इतनी प्रतिभा नहीं होती कि बड़ा काम नौकरी, व्यापार कर सकें। और हम जीवन भर मनमसोस कर रह जाते हैं ।
     योग हमें वह रास्ता बताता हैं जिससे हम  शरीर, मन, बुद्धि, प्रतिभा, पराक्रम, व्यवहार, गुण, चरित्र रुपी शक्तियों को बढ़ा सकते हैं,  इनका पूर्ण उपयोग कर सकते हैं। बीमार स्वस्थ्य हो सकता है, बुद्धू प्रतिभाशाली बन सकता है, चंचल मन एकाग्र बन सकता है, डरपोक पराक्रमी बन सकता है, व्यवहार कुशल बन सकता है।  फिर हम जीवन के सभी दिशाओं में Carrier, Health, Relationship, Happiness या कुछ भी अपनी मन चाही सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
     योग आधारित जीवन हमें स्वस्थ्य-सफल जीवन का आधार देता है। समाज में फैले भ्रष्टाचार, अपराध, अनैतिकता का भी यह पूर्ण उपचार है।  क्रमशः