Tuesday, July 15, 2014

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बूढ़े बाज की उड़ान

बाज लगभग ७० वर्ष जीता है, पर अपने जीवन के ४०वें वर्ष में आते आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है। उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं। पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है और शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं। चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है। पंख भारी हो जाते हैं और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, उड़ानें सीमित कर देते हैं। भोजन ढूढ़ना, भोजन पकड़ना और भोजन खाना, तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं। उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं, या तो देह त्याग दे, या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे, या स्वयं को पुनर्स्थापित करे, आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।

मन अनन्त, जीवन पर्यन्त
जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बा। बाज पीड़ा चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है। वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, अपना घोंसला बनाता है, एकान्त में और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया। सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है, अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं पक्षीराज के लिये। तब वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने की। उसके बाद वह अपने पंजे उसी प्रकार तोड़ देता है और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने की। नये चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक एक कर नोंच कर निकालता है और प्रतीक्षा करता पंखों के पुनः उग आने की।

१५० दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा और तब कहीं जाकर उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान, पहले जैसी नयी। इस पुनर्स्थापना के बाद वह ३० साल और जीता है, ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।

प्रकृति हमें सिखाने बैठी है, बूढ़े बाज की युवा उड़ान में जिजीविषा के समर्थ स्वप्न दिखायी दे जाते हैं।

अपनी हों उन्मुक्त उड़ानें पंजे पकड़ के प्रतीक हैं, चोंच सक्रियता की द्योतक है और पंख कल्पना को स्थापित करते हैं। इच्छा परिस्थितियों पर नियन्त्रण बनाये रखने की, सक्रियता स्वयं के अस्तित्व की गरिमा बनाये रखने की, कल्पना जीवन में कुछ नयापन बनाये रखने की। इच्छा, सक्रियता और कल्पना, तीनों के तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं, हममें भी, चालीस तक आते आते। हमारा व्यक्तित्व ही ढीला पड़ने लगता है, अर्धजीवन में ही जीवन समाप्तप्राय लगने लगता है, उत्साह, आकांक्षा, ऊर्जा अधोगामी हो जाते हैं।

हमारे पास भी कई विकल्प होते हैं, कुछ सरल और त्वरित, कुछ पीड़ादायी। हमें भी अपने जीवन के विवशता भरे अतिलचीलेपन को त्याग कर नियन्त्रण दिखाना होगा, बाज के पंजों की तरह। हमें भी आलस्य उत्पन्न करने वाली वक्र मानसिकता को त्याग कर ऊर्जस्वित सक्रियता दिखानी होगी, बाज की चोंच की तरह। हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी, बाज के पंखों की तरह।

१५० दिन न सही, तो एक माह ही बिताया जाये, स्वयं को पुनर्स्थापित करने में। जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही, बाज की तरह।

बूढ़े बाज तब उड़ानें भरने को तैयार होंगे, इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी।

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अपने माता पिता का सम्मान करने के 35 तरीके......


(
भगवान ... हमें इन दिशा निर्देशों का पालन करने की क्षमता व भावना दे)

1.
उनकी उपस्थिति में अपने फोन को दूर रखो
2.
वे क्या कह रहे हैं इस पर ध्यान दो
3.
उनकी राय स्वीकारें
4.
उनकी बातचीत में सम्मिलित हों
5.
उन्हें सम्मान के साथ देखें
6.
हमेशा उनकी प्रशंसा करें
7.
उनको अच्छा समाचार जरूर बताये
8.
उनके साथ बुरा समाचार साझां करने से बचें
9.
उनके दोस्तों और प्रियजनों से अच्छी तरह से बोलें
10.
उनके द्वारा किये गए अच्छे काम सदैव याद रखें
11.
वे यदि एक ही कहानी दोहरायें तो भी ऐसे सुनें जैसे पहली बार सुन रहे हो
12.
अतीत की दर्दनाक यादों को मत दोहरायें
13.
उनकी उपस्थिति में कानाफूसी न करें
14.
उनके साथ तमीज से बैठे
15.
उनके विचारों को न तो घटिया बताये न ही उनकी आलोचना करें
16.
उनकी बात काटने से बचें
17.
उनकी उम्र का सम्मान करें
18.
उनके आसपास उनके पोते/पोतियों को अनुशासित करने अथवा मारने से बचें
19.
उनकी सलाह और निर्देश स्वीकारें
20.
उनका नेतृत्व स्वीकार करें
21.
उनके साथ ऊँची आवाज में बात न करें
22.
उनके आगे अथवा सामने से न चलें
23.
उनसे पहले खाने से बचें
24.
उन्हें घूरें नहीं
25.
उन्हें तब भी गौरवान्वित प्रतीत करायें जब कि वे अपने को इसके लायक न समझें
26.
उनके सामने अपने पैर करके या उनकी ओर अपनी पीठ कर के बैठने से बचें
27.
न तो उनकी बुराई करें और न ही किसी अन्य द्वारा की गई उनकी बुराई का वर्णन करें
28.
उन्हें अपनी प्रार्थनाओं में शामिल करें
29.
उनकी उपस्थिति में ऊबने या अपनी थकान का प्रदर्शन न करें
30.
उनकी गलतियों अथवा अनभिज्ञता पर हँसने से बचें
31.
कहने से पहले उनके काम करें
32.
नियमित रूप से
उनके पास जायें
33.
उनके साथ वार्तालाप में अपने शब्दों को ध्यान से चुनें
34.
उन्हें उसी सम्बोधन से सम्मानित करें जो वे पसन्द करते हैं
35.
अपने किसी भी विषय की अपेक्षा उन्हें  प्राथमिकता दें

माता - पिता इस दुनिया में सबसे बड़ा खजाना हैं....

uchchstariya patra

 कैसे करें युग निर्माण का बड़ा काम 

मित्रो ! गुरु कार्य करने हेतु हम प्राणपन से प्रयास करते हैं | गायत्री यज्ञ, झोला पुस्तकालय, सप्त क्रांति आंदोलन, विचार क्रांति कार्यक्रम में हम पूरी निष्ठा-समर्पण से कार्य करते हैं | कुछ नया एवं कुछ बड़ा करने की नयी-नयी योजनाएँ बनाते हैं | गुरु-भक्ति की यह राह प्रशंसनीय है | परंतु गुरुदेव के वह ब्रह्मवाक्य सदैव याद रखें, "योजनाएँ बनती भी रहेंगी एवं बिगड़ती भी रहेंगी, देखना यह है कि जिस भावना (पात्रता) को ले कर चले थे, उस मे कभी न्यूनता ना आने पाए | बड़े कार्य बड़ी पात्रता-योग्यता वाले ही कर पाते हैं" |
  हाँ मित्रों, युग निर्माण का बड़ा कार्य करने के लिए बड़ी-योजना, बड़ा-संगठन या बड़े-सामग्री की उतनी आवश्यकता नही | अपितु परम आवश्यक है "बड़ी पात्रता" की | जिसकी जितनी बड़ी पात्रता, उसका उतना बड़ा युग निर्माण | तभी तो विवेकानंद अकेले होते हुए भी सारी दुनिया मे श्री रामकृष्ण परमहंस जी का कार्य सफलतापूर्वक कर आए | हमें भी यही करना है |
  बड़ी पात्रता हेतु युगऋषि ने सूत्र दिया है, "उपासना, स्वाध्याय, जीवन साधना, लोक आराधना को नियमित, निरंतर, पूर्ण प्रेम-भाव से किया जाएँ एवं इसे करने के लिए आवश्यक समय, श्रम, धन को भी नियमित-निरंतर रूप से निकाला जाए तो कोई भी व्यक्ति युग निर्माण हेतु उच्च पात्रता संवर्धन कर सकता है" |
   मित्रों फ़ॉर्मूला हमारे पास है, युग परिवर्तन का महान अवसर हमारे सामने है, युगऋषि का आश्वासन हमारे साथ है, तो फिर देर किस बात की, अभी-इसी पल से अपनी भूलों को सुधारते हुए जुट जाएँ "उच्चस्तरीय पात्रता" संवर्धन में, और पाएँ  युगऋषि के दिव्य अनुदान |

Tuesday, July 1, 2014

Pragya Abhiyan 16 Jan 2014

उच्च स्तरीय कार्यों के अनुरूप व्यक्तित्व को ऊँचा बनाने की साधना को प्रखर बनायेँ

                                                                         प्रज्ञा आभियान 16 जनवरी 2014


Pragya Abhiyan 1 July 2014


गुरुपर्व पर श्रद्धा को सक्रीय बनायें, कुछ महत्वपूर्ण करने-करानें के संकल्प उठाएँ

                                                                                               प्रज्ञा आभियान 1 जुलाई 2014



Monday, June 30, 2014

Samay aagya hi Yug Nirmaan kaa

                ***** कमर कस लो साथियों, समय आ गया है युग निर्माण का  *****   

पूज्य गुरुदेव युगऋषि नए कहा था कि 2014  के बाद देश में परिवर्तन की बहार आयेगीं । क्रांतियाँ इस प्रकार आयेंगी जैसे रेलगाड़ी के डिब्बे एवँ एक के बाद एक करके देश की दिशा एवं दशा सुधार देंगी ।
  यदि हम वर्तमान समय में राष्ट्र की समीक्षा करें तो स्पष्ट रूप से राष्ट्र निर्माण की प्रखर संभावनाएं दिख रही हैं। युगऋषि की घोषणाओं के साकार होने का समय आपहुँचा है, हमे तैयार रहना है । 
  आने वाले समय में युगनिर्माण की अग्रिम पंक्ति में वही आ पाएँगे जिन्होंने पिछले समय में अपने आप को 'उपासना-जीवन साधना-आराधना-नियमितता-निरन्तरिता' की भट्टी में तपाया है । युग ऋषि अनुसार 'प्रखर प्रतिभा के धनी, उच्च प्राणऊर्जा से भरे एवं सज़ल मानवीय संवेदनाओ से ओत-प्रोत व्यक्ति ही युगनिर्माण की अग्रिम पंक्ति में नजर आयेंगे' ।  
  मित्रों हमें अपनी आत्म-समीक्षा करनी चाहिऐं, कहीँ ऐसा ना हो कि युगऋषि से जुड़ने के बावजूद हम उनके कथन अनुसार अपने आप को समय रहते तैयार ना कर पायेँ और समय बीतने पर सिर्फ़ पछताते ही रह जाएँ ।
                                                                                                            -- गुरु पूर्णिमा २०१४

Wednesday, June 11, 2014

  गुरुसाधना एवं गुरुकृपा

प्रिय मित्रो ! हमारे सामने  ज्येष्ठ पूर्णिमा (13 जून)  है एवं ठीक एक महीने बाद वह पावन दिन है जिसका हर शिष्य को बेसब्री से इंतजार रहता है  "श्री गुरुपूर्णिमा" (12 जुलाई) ।  क्यों ना इस गुरुपूर्णिमा में हम विशेष गुरुसाधना द्वारा अपने शिष्यतत्व को जागृत करें  एवं अपने प्रिय गुरुदेव का पूर्ण आशीर्वाद , उनका दिव्य प्रेम अनुदान प्राप्त करें। यदि आप यह चाहते हैं तो आगे की पंक्तियाँ आपके लियें हैं ।
             गुरु कृपा का विशेष अनुदान पाने का एक मात्र रास्ता होता है गुरुध्यान, गुरुभक्ति,गुरुसेवा,गुरुकार्य एवं गुरुआज्ञा पालन । और जब यह संकल्पित हो कर किया जाता है तो शिष्य की भक्ति, 'निष्ठा' की शक्ति में बदल जाती है एवं पूर्णाहुति के साथ ही उसे मिलता है गुरु का विशेष अनुदान । गुरु का विशेष आशीर्वाद जो कि शिष्य के जीवन को बदल  देता है । शिष्य का आत्मिक कायाकल्प हो जाता है, भौतिक जीवन की परेशानियों से स्वयं मुक्ति मिलती है एवं बहुत कुछ जो हमारी कल्पना से परे  है । आप स्वयं इसे अपने जीवन में अनुभव कर सकते हैं और प्रस्तुत समय (13 जून से 12 जुलाई, गुरुपूर्णिमा) इस उद्देश्य के लियें श्रेष्ठ समय है ।
             हमारे गुरुदेव ने गुरुभक्ति,गुरुसेवा,गुरुकार्य एवं गुरुआज्ञा को  एक  सूत्र  में गूंथ कर सरल बना दिया, एवं हमारे सामने रख दिया । वह सूत्र है "भाव भरी उपासना, स्वाध्याय, जीवन साधना एवं युग निर्माण कार्य की आराधना " और इन्हें करने के लिए  "समयदान, श्रमदान, अंशदान" । कितना सरल रूप प्रस्तुत कर दिया गुरुदेव ने जिसमे गुरुभक्ति,गुरुसेवा,गुरुकार्य सब कुछ समा जाता है , और हम यह करते भी हैं ।
             हम इन सूत्रों से परिचित हैं, परन्तु वह सूत्र जो इनको दिव्य बनाता है वह है "नियमितता-निरंतरता" । मित्रो पूज्य गुरुदेव ने कभी संख्या को महत्त्व  नहीं दिया परन्तु गुणवत्ता पर हमेशा बल दिया । "नियमितता-निरंतरता"  ही वह सूत्र है जो हमारे किसी  भी छोटी  से छोटी साधना या छोटे से  युग निर्माण के कार्य को दिव्य बना सकता है  हमे साधना के उच्चतर स्तर तक पहुंचा सकता है ।
             नियमितता का अर्थ है निश्चित समय  एवं निरंतरता का अर्थ है रोज़ करना । दुनिया  इधर की उधर हो जाये, परन्तु हमारी "नियमितता-निरंतरता" पर आँच ना आने पाये । बुद्धिमानी यही होती है कि पहले   "भाव भरी उपासना, स्वाध्याय, जीवन साधना एवं युग निर्माण कार्य की आराधना " के लियें बहुत ही छोटे संकल्प लिए जाएँ एवं उन्हें नियमित-निरंतर रूप में किया जाये । फिर धीरे-धीरे आत्म-प्रेरणा के आधार पर संकल्प बढ़ाये जाएँ ।
              उपासना भले ही 10 मिनट की हो या 4 घंटे कि, भावभरी होनी चाहिए । स्वाध्याय चिंतन-मनन युक्त होना चाहियें । जीवन साधना में संयम के सूत्र एवं युगनिर्माण सत्संकल्प के सूत्र होने चाहिए एवं युगनिर्माण कार्य को  अपनी रुचि, योग्यता, परिस्थिति अनुसार चयन करना चाहिए । इन सभी कार्यो को करने के लियें समय,श्रम,धन की आवश्यकता होगी । उसे श्रमदान-समयदान-अंशदान के रूप में निकालना चाहियें ।
              इसके साथ एक दिव्य गुरुसाधना साधना भी है जिसे करते हुए एक सामान्य साधक भी धीरे आध्यात्म  की ऊँचाइयों पर चल पड़ता है और पूर्ण गुरुभक्ति, गुरुकृपा प्राप्त कर अपना जीवन धन्य करता है । वह साधना है "श्री गुरुगीता" की अनुपम साधना ।
              श्रीगुरुगीता के मंत्रो में वह दिव्य सामर्थ्य है कि वो पाषाण हृदय को भी महान गुरुभक्त बना दे । श्रीगुरुगीता के नियमित-निरंतर पाठ से साधक के अंतःकरण में गुरुकृपा का अवतरण होता है जो कि उसके जन्म-जमान्तरों के पापों को धो कर उसे शुद्ध-बुद्ध-पवित्र-निर्मल बना देता  है । जो कई जन्मों की साधना से संभव नहीं होता वह मात्र श्रीगुरुगीता के पाठ एवं वेदमाता गायत्री की भावभरी उपासना से संभव हो जाता है । चाहे भौतिक-आध्यात्मिक कामना हो या निष्काम प्रेम भावना , सभी में श्रीगुरुगीता बिना माँगे समस्या  का समाधान करती  है , दिव्य अनुदान बरसाती है । लेकिन यह होता केवल उन्हें है  जो संकल्पवान हैं, धैर्यवान हैं, मेहनत करना जानते हैं और उन्हें अपने गुरुदेव पर पूर्ण विश्वास है ।
               संकल्प ले कि "मैं  (नाम), (गोत्र)
गोत्र, (क्षेत्र)क्षेत्र,  (आज की तारीख) तिथि से पूर्ण गुरुकृपा प्राप्त करने हेतु पूरे मास(या जितना समय हो ) गुरुपूर्णिमा पर्यन्त, नियमितता  एवं निरंतरता का पालन करते हुए  (इतना) गायत्री उपासना , (इतना) स्वाध्याय , (इन संयमो की ) जीवन साधना एवं (इस कार्य की) आराधना करूँगा/करुँगी । नियमितता  एवं निरंतरता का पालन करते हुए श्रीगुरुगीत का (इतना) जप करूंगा/करूंगी । कृपया संकल्प पूर्ण  करने हेतु दिव्य आशीर्वाद प्रदान करें,  दोष परिमार्जन प्रदान करें ।"
                यहाँ 'इतना' में संख्या का महत्त्व नहीं है , यह 1 माला भी हो सकती है एवं 30 माला भी , यह 1 घंटे का स्वाध्याय भी हो सकता है या 1  पेज का भी, समय-अर्थ-विचार-इंद्रिय संयम में से कोई भी एक हो सकता है, युग निर्माण कार्य में विचार के पोस्ट भेजना या 5 स्टिकर  चिपकाना जैसा कोई भी छोटे से छोटा या बड़े से बड़ा कार्य हो सकता है । आवश्कता है इसे रोज़ करना एवं नियत समय पर करना । यही दिव्यता है ।
                यदि आप संकल्पवान हैं, श्रद्धावान  हैं  तो ऐसा हो ही नहीं सकता की आप सफल ना हों । आपको गुरुदेव का दिव्य आशीर्वाद मिलेगा । वह आएंगे, आप से बात करेंगे, आप को प्यार भरा आशिर्वाद देंगे, आप का मार्गदर्शन करेंगे,  कलुषित संस्कारों का नाश करेंगे एवं आप को भौतिक-आध्यात्मिक सफलता प्रदान करेंगे ।
               तो फिर देर किस बात की । अवसर का लाभ उठाएँ । जितना अच्छा हमारा आत्म निर्माण होगा, उतना अच्छा हमारा युग निर्माण का कार्य होगा । युग परिवर्तन  के महान अवसर को चूके नहीं । छोटे बलिदान दें एवं बड़े लाभ अर्जित करें । 

सबके लियें सद्बुद्धि, सबके लियें उज्जवल भविष्य ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥